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कोरोना के दौरान शुरू हुआ सफर, अब तक 500 लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर चुकी है

कोविड-19 महामारी के दौरान तमाम लोगों की जिंदगी अस्त व्यस्त हो गई थी. इस मुश्किल वक्त में तमाम लोग इलाज ना मिल पाने की वजह से इस दुनिया को छोड़ कर चले गए. वहीं कोविड-19 की महामारी के दौरान शालू सैनी एक ऐसी लड़की थीं. जिन्होंने लावारिस पड़े शवों को उनके रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम संस्कार कराया था. शालू सैनी ने साल 2020 में लावारिस पड़ी एक लाश का अंतिम संस्कार किया था और वही से इनकी जिंदगी बदल गई अब तक यह 500 लावारिस लाशों का अंतिम संस्कार कर चुकी हैं. कहा जा सकता है जिनका कोई नहीं है उनकी शालू सैनी हैं.

कोविड-19 महामारी के दौरान शुरू हुआ शालू सैनी का सफर उन बेसहारा और असहाय लोगों के लिए अब तक चल रहा है. जिनका इस दुनिया में कोई नहीं है. शालू सैनी ने दिखा दिया है कि जिसका कोई नहीं उसकी शालू सैनी है. शालू सैनी अभी तक 500 से अधिक लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर चुकी हैं.

35 बरस की शालू उन लोगों के अंतिम संस्कार का खर्चा उठाती हैं. जिनका परिवार इस खर्चे को उठाने में सक्षम नहीं होता. या उनका इस दुनिया में कोई नहीं है. बता दें, शालू सैनी एक सिंगल मदर है और वह अपने दो बच्चों को अपने दम पर ही पालती हैं. वहीं बेसहारा और असहाय लोग जहां भी देखती हैं. उनके लिए मदद भी करती हैं. शालू ने कहा माहमारी के दौरान अंतिम संस्कार करना काफी महंगा हो गया था लेकिन जैसे तैसे करके मैंने सब कुछ मैनेज कर लिया था.

कोविड-19 की स्थिति अब बदल चुकी है और देश में हालात भी धीरे धीरे ठीक हो रहे हैं, लेकिन शालू सैनी का यह सफर अभी भी नहीं थमा है. जहां भी यह लावारिस लाश याद असहाय लोग देखती हैं. उनकी मदद करती हैं यह कहती हैं कोविड-19 की महामारी के दौरान लोगों की तरफ से मदद मिली थी और उन्हें अब भी मदद मिल रही है. जिसके दम पर वह लोगों तक सेवा पहुंचाने का कार्य कर रही हैं. यह कहती हैं किसी की जान बचाना या अगर कोई मर गया है तो उसका अंतिम संस्कार करना मेरा धर्म है. बता दें, इन्हें लोग फरिश्ता मानते हैं. यह कहती हैं अब उन्हें अनजान लोगों के द्वारा भी मदद मिल जाती है.

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