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15 लाख के पैकेज की नौकरी एक झटके में छोड़ दी, शुरू की ऑर्गेनिक फार्मिंग, अब कमा रहे हैं लाखों रुपए

हमारे समाज में कई तरह के लोग मौजूद हैं. कुछ लोगों का सपना होता है कि वे अच्छे खासे पैकेज पर नौकरी करें लेकिन कुछ लोग ऐसे भी होते हैं. जो अच्छे खासे पैकेज पर नौकरी को ठुकरा देते हैं. जैसे भोपाल के रहने वाले प्रतीक ने किया था. प्रतीक बैंक में प्रोडक्ट मैनेजर के तौर पर नौकरी करते थे और इन्हें 15 लाख का सालाना पैकेज मिलता था. एमबीए की पढ़ाई करने के बाद इनके लिए यह पैकेज ठीक ठाक था लेकिन प्रतीक को इस नौकरी को काम करते हुए संतुष्टि नहीं मिल रही थी. जिसके बाद उन्होंने इस नौकरी को छोड़कर खेती करने का फैसला लिया और फाइनल तौर पर खेती-बाड़ी में लग गए.

जब इन्होंने एक झटके में 15 लाख रुपए वाले पैकेज की नौकरी छोड़ी थी तो उस समय इनके लिए घरवालों को मनाना एक बड़ी चुनौती थी, लेकिन जैसे तैसे करके उन्होंने घरवालों को संतुष्ट कर दिया और साढे 5 एकड़ जमीन में ऑर्गेनिक खेती करना शुरू किया. वर्तमान समय में यह इस जमीन में ऑर्गेनिक फार्मिंग के जरिए सब्जियां उगाते हैं. इसके अलावा कई और फसलें की मुख्य रूप से उड़ाते हैं. बता दें, प्रतीक सालाना एक एकड़ से एक लाख से डेढ़ लाख रुपए की कमाई कर लेते हैं. इतना ही नहीं इसके साथ सौ से डेढ़ सौ किसानों के साथ भी जुड़े हुए हैं. जिनका भी यहां से रोजगार चलता है.

प्रतीक बताते हैं कहने को तो वह नौकरी पर ठीक-ठाक कर रहे थे और नौकरी से मिलने वाले पैसों के दम पर उनका गुजारा हो जाता था लेकिन उन्होंने देखा कि आजकल दुकानों पर केमिकल से उगाई गई सब्जियों की भरमार है और इन से काफी शारीरिक नुकसान होते हैं. यही वजह है मैंने फैसला लिया कि मैं ऑर्गेनिक फार्मिंग के जरिए खेती करूंगा और उन सब्जियों को किफायती कीमतों पर बेचूंगा. बता दें, वर्तमान समय में अब ये फुल टाइम ऑर्गेनिक फार्मिंग करते हैं और इसके जरिए तमाम लोगों को प्रेरणा भी दे रहे हैं, ना सिर्फ प्रेरणा दे रहे हैं बल्कि कई सारे किसानों को ऑर्गेनिक फार्मिंग की तकनीक भी सिखा चुके हैं.

प्रतीक की पढ़ाई के बारे में बात करें तो इन्होंने साल 2006 में पुणे के एक प्रतिष्ठित कॉलेज से एमबीए की डिग्री ली थी. जिसके बाद इन्होंने एक बैंक में काफी समय तक नौकरी की थी. उन्होंने खुद इस बैंक में नौकरी के लिए अप्लाई किया था. यहां से इन्हें पैकेज भी ठीक-ठाक मिला था, लेकिन कुछ समय बाद ही इनका मन भटकने लगा और आखिरकार यह खेती – बाड़ी के कामकाज में एंट्री कर गए.

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